छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी इलाकों में 'खामोश क्रांति': धर्मांतरण के खिलाफ ग्राम सभाओं ने की मिशनरियों की नो-एंट्री
छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में इन दिनों एक नई 'खामोश क्रांति' जन्म ले रही है। आदिवासी समाज अब अपनी सांस्कृतिक पहचान और जड़ों को लेकर तेजी से जागरूक हो रहा है। इसके चलते कई गांवों की ग्राम सभाओं ने ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का कड़ा विरोध करते हुए उनके प्रवेश पर पाबंदी लगाना शुरू कर दिया है।
इस पूरे आंदोलन और चर्चा के मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार हैं:
ग्राम सभाओं ने दिखाई अपनी कानूनी ताकत:
इस मुहिम की शुरुआत छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से हुई, जहां एक गांव ने स्पष्ट रूप से 'फादर और पास्टर्स का प्रवेश वर्जित' का बोर्ड लगा दिया है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसलों के तहत 'पांचवीं अनुसूची' (Fifth Schedule) वाले क्षेत्रों में ग्राम सभाएं बेहद शक्तिशाली हैं। यदि ग्राम सभा को लगता है कि किसी बाहरी व्यक्ति के आने से गांव का माहौल या कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है, तो उन्हें प्रतिबंधित करने का पूरा अधिकार उनके पास है।
सांस्कृतिक पहचान और आरक्षण छिनने का डर:
आदिवासी समाज का अब यह स्पष्ट मानना है कि धर्म परिवर्तन सिर्फ प्रार्थना करने का तरीका बदलना नहीं है, बल्कि यह उनकी मूल संस्कृति और परंपराओं का विनाश है। संविधान में ST (अनुसूचित जनजाति) की परिभाषा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म और संस्कृति छोड़ देता है, तो वह अपनी विशिष्ट पहचान खो देता है। इसके परिणामस्वरूप वह भविष्य में एसटी वर्ग को मिलने वाले आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभों से वंचित भी हो सकता है।
IRS अधिकारी निशा उरांव बनीं प्रमुख चेहरा:
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामेश्वर उरांव की बेटी और खुद एक IRS अधिकारी, निशा उरांव इस आंदोलन की एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरी हैं। उन्होंने मिशनरी स्कूलों के दोहरे मापदंडों पर सीधा प्रहार किया है। उनका तर्क है कि इन स्कूलों में हिंदू छात्रों पर ईसा मसीह की प्रार्थना तो थोपी जाती है, लेकिन जब वही छात्र सरस्वती वंदना या अपनी संस्कृति की बात करते हैं, तो स्कूल प्रबंधन उस पर कड़ी आपत्ति जताता है।
एक खामोश क्रांति का उदय:
यह विरोध अब किसी एक गांव या जिले तक सीमित नहीं रह गया है। यह छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के कई आदिवासी इलाकों में एक 'खामोश क्रांति' की तरह फैल रहा है। विदेशी मिशनरियों के हस्तक्षेप को लेकर आदिवासी समाज पूरी तरह सतर्क हो चुका है, और जानकारों का मानना है कि इस बढ़ती जागरूकता का एक बड़ा और स्पष्ट असर आने वाले 5 से 7 सालों में देखने को मिलेगा।